Wednesday, June 24, 2015

Remembering V.P. Singh


Vishwanath Pratap singh (
25 June 1931 – 27 November 2008), the prophet of social justice in South Asia. is regarded one of the great political and social emancipators after Jyotirao Phule, Babasaheb Ambedkar and Periyar. He was the real king of masses and lies in the threads of 'Grand King'- Gautam Buddha, Chhatrapati Shivaji and Shahuji Maharaj who all deeply committed for justice, peace, and equality. India has seen many changes through his inclusive policies. He implemented long-waited Mandal commission’s 13 recommendations for Socially and Educationally Backward Classes where his predecessor Mrs. Gandhi and Rajeev Gandhi were not so concerned for this Report. The Prime Ministers the Gandhis encouraged notables/professionals, rich businessmen and land owning castes and garner support for their governments. But Raja Manda alias VP Singh was never worried about his politics and government.



 It is very important to note Singh’s address on Independence Day, August 15,1990.
"because the tear in the eyes of poor person remains a tear for some time but later it becomes ACID. He tears the page of history to build his own heaven on earth. So long as the tears in the eyes of poor keep wet, it is alright; but after it gets dried HIS EYES SPIT FIRE. It is the lesson of history that when the eyes of poor turn fiery the palaces of gold melt and go down the drain. It is not enough to ponder over; we have to act. Therefore we have made reservation for backward classes, gave statutory status to the SC/ST Commission and brought forward a law to ensure workers' participation in management to protect their rights and to ensure that LABOUR HAVE A SHARE IN THE MANAGEMENT OF THE COUNTRY."

He earned defame among notables/professionals, rich businessmen and land owning castes and India has experienced  many anti-Mandal, anti-masses policies related to polity, society, industry and welfare state. The reactionary forces open industries, universities, hospitals to anti-Mandal  forces to counter VP Singh's come-to-be an egalitarian India. Singh always believed in inclusive India and he proudly replied to opponents, ""you can see that my every action before MANDAL was great, excellent, and everything I did after amounted to the greatest disservice to India…..Though my leg was broken, i hit the goal.” Singh gave  a befitting reply to  anti-Mandal forces, " there is certain price tag to everything, and you have to be prepared to pay that price. You can not get the thing and then regret paying. The price.....maal liya to dena padega. Mandal implement kiya to uska daam bhi dena para... And then why should I be seeking approval of others all the time, why? that is one basic questions. For instance today I feel that forces for social justice should not preach hatred and I know when I say this, I invite the anger of some extreme sections. So does that mean I should not say what I believe? "(excerpt from  Seema Mustafa’sThe Lonely Prophet).  He was an iconoclast for fundamentalist and feudal forces.

 He was a true leader of shoshits/peasants and he restructured Jan Morcha after his retirement from active politics to make a platform for landless masses and non-notables. He fought against corruption and exposed India's ugly Boforce Scam. He was a true secularist. He stood against religious extremists, the Hindutva and Jamat forces. He warned many times that communal and divisive forces are opponent of social justice and egalitarian society. He introduced 'ration card' for masses under BPL. The Dalit Sikhs and Nav Bauddhs indentified as SCs in his tenure. His government awarded Bharat Ratna to Babasahb Bhimrao Ambedkar and Nelson Mandela for their emancipatory and revolutionary role both respective countries, India and South Africa. Now It is high time to allot a 'just space' for his memorial park in New Delhi and award Bharat Ratna to him for his emancipatory role for the upliftment of Socially and Educationally Backward Classes, more than 50 percent India's population.
The sole Prime Minister who launched a fight against corruption, implement Mandal Commission, Baba Saheb Ambedkar and Nelson Mandela got Bharat Ratna during his tenure, give BPL Cards to proletaians and what not he did in his short term just less than one year. He empowered oppressed sections of this nation. And we and our lofty leaders never remember him. He should be remembered by proletarians atleast. He should be awarded BHARAT RATNA.






Wednesday, May 27, 2015

गुर्जर आन्दोलन बार-बार क्यों भड़कता है?

गुर्जर आन्दोलन बार-बार क्यों भड़कता है?

राजस्थान में गुर्जर आन्दोलन का ये द्वितीय चरण है, गुर्जर OBC कोटे में 5 प्रतिशत विशेष आरक्षण की मांग कर रहे है, इसके लिए वे रेल की पटरियों और राष्ट्रीय राजमार्ग पर डटे हुये है, फिलहाल गुर्जर OBC वर्ग में ही है लेकिन उनका आरोप है कि अन्य सबल OBC समुदायों के चलते उनका हक़ छीना जा रहा है.  पहला आन्दोलन 2007 में हुआ था उस समय गुर्जर ST कोटे में शामिल होने के लिये लड़ रहे थे. उस समय  भी वसुन्धरा राजे मुख्यमंत्री थी. 
मुख्यमंत्री ने कोई ठोस हल नहीं निकाला. राज्य सरकार और गुर्जर आरक्षण के प्रतिनिधियों की वार्ता विफल हुयी जिससे आन्दोलन और उग्र हुआ . करीब 50 से ज्यादा गुर्जर गोलीबारी में मारे गये थे. राज्य सरकार ने गुर्जरों को संतुष्ट करने के लिये डि-नोटिफाइड ट्राइब्स के कोटे में शामिल करने के लिये राष्ट्रपति को पत्र लिखा. 2008 में राजस्थान सरकार ने  गुर्जरों को 5%अलग से आरक्षण देने का बिल पास किया. लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट ने स्टे लगा दिया कि आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं दिया जा सकता. तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गुर्जरों को 1% आरक्षण का प्रावधान किया और बाकी 4% के लिये कोर्ट का निर्णय आने तक के लिए रोक दिया. दिसंबर, 2008 में हाई कोर्ट ने गुर्जर के 5% आरक्षण को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया. गुर्जर आन्दोलन ने अब अपनी मांगो का दायरा बदल दिया अब वे OBC कोटे में 5% प्रतिशत विशेष आरक्षण की मांग कर रहे है. सरकार के साथ वार्तायें जारी है. लेकिन कोई हल नहीं दिख रहा है.

भाजपा और कांग्रेस दोनों गुर्जरों की मांग का स्थायी हल ढूँढने में असफल रही है. गुर्जरों का  कहना है कि उनके समुदाय से अभी तक कोई IAS नहीं बना है, सरकारी पदों पर उनकी संख्या नगण्य है. लेकिन OBC आरक्षण  में किन-किनको विशेष कोटा दिया जाये.. सच्चर कमेटी ने मुसलमानों को विशेष कोटा देने की सिफारिश की है. सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को विशेष   कोटा देने के लिए कहा है. जो भी समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है उन्हें OBC कोटे में डालने का प्रस्ताव कर दिया जाता है. OBC आरक्षण के अन्दर आने वाले समुदायों में आन्तरिक कलह बढ़ रही है. अब केंद्र सरकार को इसमें दखल करनी चाहिये जाति-आधारित जनगणना को अति-शीघ्र करवाकर. जाति-जनगणना करवाने से सभी जातियों के  सामाजिक-आर्थिक- शैक्षणिक स्तर के आंकड़े मिल जायेंगे जिससे आरक्षण व्यवस्था और अफर्मेटिव एक्शन की योजनाओं को न्यायसंगत व्यवस्थित किया जा सकता है.

Friday, April 10, 2015

भारतीय जन-मानस के महात्मा- ज्योतिराव फूले

आधुनिक भारत के निर्माता और ‘सामाजिक क्रांति के पिता’  महात्मा ज्योतिराव  फूले का जन्म 1827 को पुणे (महाराष्ट्र) में गोविंदराव जी के घर पर हुआ था. ज्योतिराव जब एक साल के थे तभी उनकी माँ का परिनिर्वाण हो गया था. गोविन्दराव जी  अपने समाज के सपन्न व्यक्ति थे. ज्योतिराव जब अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद अपने पिता के व्यवसाय में हाँथ बंटाने लगे. उनके पडोसी जो कि प्रायः शेख परिवार और इसाई परिवार थे, ज्योतिराव की तीव्र प्रतिभा को देखते हुए  आगे पढने के लिए प्रोत्साहित  किया. ज्योतिराव ने 1841 पुणे के स्काटिश मिशन हाई स्कूल में दाखिला लिया. उनके ऊपर मिशनरी शिक्षा का बहुत प्रभाव पड़ा. वे भारतीय समाज में व्याप्त अशिक्षा और असमानता के प्रति चिंतित हो उठे. जब ज्योतिराव 13 वर्ष के थे तभी उनका विवाह सावित्रीबाई से हो गया था. सावित्रीबाई को ज्योतिराव फूले ने घर में ही पढाया और उन्हें आधुनिक शिक्षा दी. बाद में सावित्रीबाई भारत की प्रथम महिला शिक्षक बनी.
 1848 में हुयी घटना ने ज्योतिराव को झकझोर दिया.  एक ब्राह्मण साथी ने बरात में ज्योतिराव फूले को आमंत्रित किया था. बारात में जब उनकी जाति का पता लगा तो बाराती लोगों ने उनका अपमान किया. ज्योतिराव के मन को  गहरी चोट लगी. ज्योतिराव ने प्रण  किया वे अपनी जिंदगी पिछड़े और महिलाओं के उत्थान में लगा देंगे.
1848 में ज्योतिराव ने पुणे में पहला स्कूल खोला. पिछड़े वर्ग की  लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1848 में यह स्कूल खोलकर महात्मा फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था। उनके अपने पिता गोविंदराव जी भी उस वक्त के सामंती समाज के बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। पिछड़े समाज की  लड़कियों के स्कूल के मुद्दे पर बहुत झगड़ा हुआ लेकिन ज्योतिराव फुले ने किसी की न सुनी। नतीजतन उन्हें 1849 में घर से निकाल दिया गया। सामाजिक बहिष्कार का जवाब महात्मा फुले ने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया। जब 1868 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गयी तो उन्होंने अपने परिवार के पीने के पानी वाले तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया।



महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। उनकी किताब ‘किसान का कोड़ा’ उस समय के किसानो, जिन्हें फूले ने  कुंडबी (कुर्मी) लिखा, उनकी  बदहाली का चित्रण किया है. फूले ने छत्रपति शिवाजी को किसानो का प्रेरणास्रोत बताया. शिवाजी के राज्यकाल में किसान ही उनकी सेना में सिपाही होते थे. शिवाजी स्वयं एक कुर्मी-किसान परिवार से थे इसलिये वे किसानों को अपने परिवार का अंग मानते थे. फूले जी छत्रपति शिवाजी को ‘लोकराजा’ बोलते थे.  फूले ने अपनी रचनाओं में    पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है। गरीब किसानों  के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की। जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था। इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा  फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया।

स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। फुले ने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की। प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था। इसीलिए उन्होंने पंडिता रमाबाई के समर्थन में लोगों को लामबंद किया, जब उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गयीं। वे धर्म परिवर्तन के समर्थक नहीं थे लेकिन महिला द्वारा अपने फ़ैसले खुद लेने का उन्होंने समर्थन किया।

फूले साहब का प्रथम उद्देश्य था- एक समान  प्राथमिक  शिक्षा. उन्होंने प्राथमिक शिक्षा के लिए लिए शिक्षक  की योग्यता और पाठ्यक्रम  पर ध्यान दिया. उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को  भारत की महिला शिक्षक होने का गौरव प्राप्त है. उनके लिए शिक्षा सामाजिक बदलाव का एक माध्यम थी.  बाबा साहेब आंबेडकर फूले को अपना गुरु मानते है. उनका मानना था सामाजिक बदलाव की निरंतरता तभी बनी रह सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति को पूरी शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर प्राप्त  हो.
विद्या बिना मति गयी,
मति बिना गति गयी
गति बिना नीति गयी
नीति बिना संपत्ति गयी,
इतना घोर अनर्थ मात्र,
अविद्या के ही कारण हुआ.

उनके समय में महिलाओं और पिछड़ी जातियों के लिए पढाई करना दिन में सपने देखने जैसा था. महात्मा फूले ने जान की परवाह किये बिना जन-शिक्षा का मिशन शुरू किया.. आज पूरे विश्व में एक सामान शिक्षा की मुहिम चल रही है.
फूले को विधवा पुनर्विवाह के आन्दोलन का जनक माना जाता है.  विधवाओं के लिए अपने आश्रम खोले और बाल विवाह प्रथा को बंद करवाने के लिए आन्दोलन किया. फूले दम्पति ने विधवाओं के पुनर्वास और अनाथ बच्चों के लिए कई अनाथालय खोले. यहाँ तक कि 1873 में  एक विधवा ब्राह्मणी के बच्चे को उन्होंने गोद लिया और उसका नाम  यशवंत फूले रखा.
महात्मा फूले ने 1873 अपने अनुयायी और समर्थको के साथ ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना की. सत्य शोधक समाज का प्रमुख उद्देश था-पिछड़े, दलित और महिलाओं को शोषणकरी व्यवस्था से छुड़ाना और उन्हें शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाना. 1873 में उनकी महान रचना ‘गुलामगिरी’ प्रकाशित हुयी. 1876 में पुणे नगर निगम के पार्षद बने. उस समय पूरा पूना प्लेग महामारी से ग्रस्त था. फूले दम्पति ने प्लेग रोगियों की अथक सेवा की और स्वयं ज्योतिराव फूले की म्रत्यु 28 नवम्बर 1890 को प्लेग महामारी से हो गयी. फूले साहब ताउम्र शोषितों को लिए अन्यायकारी व्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे. उन्होंने देशमें शिक्षा के आन्दोलन को जन्म दिया जो अनवरत चल रहा है. उन्हें भारत में ‘सामाजिक क्रान्ति’ का पिता कहा जाता है.

ज्योतिराव फूले  भारत में एकसमान शिक्षा  प्रणाली और भारत में किसानो के आदोलनो के सूत्रधार बने. वे भारत में सामाजिक न्याय के प्रवर्तक के रूप में जाने जाते थे और दलित-पिछडो और महिलाओं के हित और अधिकारों के लिए लड़ा. बाबासाहेब आम्बेडकर उन्हें अपना गुरु मानते थे. आधुनिक भारत में  समतामूलक  समाज की  कल्पना  ज्योतिराव फूले के बिना पूरी नहीं होती.  महात्मा गाँधी ने ज्योतिराव फूले को ‘महात्मा’ की उपाधि दी थी और कहा था कि ज्योतिराव सच्चे अर्थो में महात्मा थे. भारत सरकार को  समतामूलक समाज के ऐसे महात्मा को भारत रत्न से  सम्मानित करना चाहिये. 

Tuesday, November 11, 2014

प्रोफ़ेसर पांडियन, आप बहुत याद आओगे

प्रोफ़ेसर पांडियन, आप बहुत याद आओगे.


समय था  जुलाई 2011, जब JNU में मै और मेरे साथी All India Backward Students’ Forum (AIBSF) की स्थापना के बारे में विचार विमर्श कर रहे थे. JNU में OBC का आरक्षण लागू नहीं हुआ था और  2008 से  JNUSU भी सस्पेंड हो गया था. उस समय प्रोफ़ेसर पांडियन और स्कूल ऑफ़ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स (SAA-JNU) के संतोष हम सभी से मिलने आये थे. संगठन की क्या विचारधारा होगी, OBC आरक्षण के मुद्दे से कैसे फैकल्टी और छात्र समुदाय को जोड़ना चाहिए, इन सब पर  पांडियन सर ने एक मार्गदर्शक की तरह हमारी मदद की. लगातार दो दिनों तक हम विमर्श करते  रहे. उसके बाद मेरा जुड़ाव लगातार बाना रहा. AIBSF के अध्यक्ष पद (2011-2012) पर रहते हुए मुझे आरक्षण के मुद्दे पर, Viva Voce के सम्बन्ध में  पांडियन सर से लगातार मार्ग दर्शन मिलता रहा. वे हमेशा मित्रवत बाते करते थे और राज्य के चरित्र, पिछडो-दलितों की रहनुमाई करने वालों की स्वार्थी करतूतों के खिलाफ आगाह करते रहते थे. वे एक उम्दा शिक्षक थे और एक बेजोड़ लेखक. द्रविड़ राजनीति, सिनेमा कल्चर, सामाजिक न्याय, जाति और राष्ट्रवाद से सम्बंधित  उनके लेख अद्वितीय है. जब बौद्धिक विमर्श में इ.वी. रामासामी ‘पेरियार’ के योगदान और उपलब्धियों को लगतार नजरंदाज किया जा रहा था, पांडियन सर ने बौद्धिक वर्चस्व को चुनौती देते हुते पेरियार के योगदान और गैर-ब्राह्मण बौद्धिक परम्परा का पुनर्पाठ किया. जाति-विमर्श और राजनीति को वे पाठ्यक्रम का एक अभिन्न हिस्सा मानते थे और खुल कर बहस करते थे. उनका जाना पूरे बौद्धिक समुदाय के लिए एक अपूर्णीय क्षति है.  हमने एक बेहतरीन शिक्षक और मार्गदर्शक खो दिया. प्रोफ़ेसर पांडियन आप बहुत याद आओगे.

Monday, October 27, 2014

12 फरवरी 1949 के बाद सरदार पटेल कम्युनल कब और कैसे हो गये?

 एक वीडियों का ट्रांसक्रिप्ट है जिसमे सरदार पटेल 12 फरवरी 1949 को  अपना भाषण दे रहे है.(वीडियों का लिंक नीचे दिया गया है) 



“हमारा कर्तव्य ये है कि हमें निश्चय कर लेना चाहिए, हमें.. हिन्दुस्तान में जितने लोग है सब लोगों को हिल-मिल के भाई-भाई की तरह रहना है, और एक दूसरे के साथ घुड़का –घुड़की करने से काम नहीं होगा. कोई भी खून हो हिन्दू हो, मुसलमान हो, सिख हो, पारसी हो इसाई हो सबको ये ही समझना चाहिए कि ये हमारा मुलक है हमें निश्चय कर लेना चाहिए जितना हो सके हमसे, इतना कोशिश करके आपस में मिल-जुल करके रहने की कोशिश करना चाहिए. हमारा ये कर्तव्य है कि जिस मोहल्ले में हम रहते है, जिस शहर में हम रहते है, हम एक खुदा की औलाद है, हम ईश्वर की प्रजा है,  हम सब एक बाप के, एक माँ-बाप के परिजन है. तो जैसे सर्व-धर्म का सार जबकि लोग एक रहे, सब कौम के सब जाति के, कोई फरक न रखे और कोई ऊँच नही और कोई नीच नहीं सभी एक सामान है. क्योंकि इंसान में जो आत्मा है जो छोटी सी चीज है जिससे वो खड़ा है वो ईश्वर का अंश है. उसमे ऊँच क्या नीच क्या, पवित्र क्या अपवित्र क्या. पवित्र तो वो होता है जो अपना जीवन पवित्र करें, अपवित्र वो ही है जो ख्याल अपवित्र रखता है, जो अपना जीवन अपवित्र रखता है. तो हमारे में न कोई स्प्रश्य होना चाहिए, न ही  अस्प्रश्य होना चाहिए सभी एक समान है, न कोई ऊँच है न कोई नीच है हमें सबको एक समान भाव से देखना है, सबको साथ मिल जुलकर रहना है. प्रेम से रहना है.” 


तो 12 फरवरी 1949 के बाद सरदार  पटेल कम्युनल कैसे  हो गये? ये देश आप सभी की राय जानना चाहता है.

http://youtu.be/QLAbNqKKxY0

Friday, September 5, 2014

Savitribai Phule: The real Mother India


Savitribai Phule waged an inspired life-long battle against caste inhumanity, patriarchy and the oppressive orthodoxy of her time. She rose to become modern India’s First Women Teacher, and the first to lead an emancipator struggle of women, dalits, lower castes, workers and peasants. 
As a teacher she encouraged women education. She was often abused by groups of men with orthodox beliefs who opposed education for women. Impressed by Savitri, her student Muktabai poignantly describes the wretchedness and lambastes the brahmanical religion and culture for degrading and dehumanizing her people. 

As a social revolutionary she has an outstanding role in women’s empowerment, especially widow’s welfare. The Phule couple set up a home for the welfare of unwed mothers and their offspring, in 1853. Savitribai proved to be a caring mother to the women who found refuge in home. She is also known to have taken the lead in organizing the boycott by the barbers against the shaving heads of widows in the 1860s. 
In the 1870s, the Phules were actively involved in famine relief. They were instrumental in starting 52 boarding schools for the welfare of the children orphaned in the famines. Mahatma Phule passed away on Nov. 1890. Even at the funeral, Savitribai showed her gritty character. She stepped forward to light the pyre. This perhaps, this was one of the very rare instances in the history of India, where the wife lit the funeral pyre of the husband.
In 1897, an epidemic swept Pune. Savitribai was engaged personally in the relief effort during this tragedy as well. This time, she was afflicted by plague, and died on March 10, 1897.
Savitribai Phule, struggled and suffered with her revolutionary husband in an equal measure, but remains obscured due to casteist and sexist negligence. Apart from her identity as Jotirao Phule’s wife, she is little known even in academia. Modern India’s first woman teacher, a radical exponent of mass and female education, a champion of women’s liberation, a pioneer of engaged poetry, a courageous mass leader who took on the forces of caste and patriarchy certainly had her independent identity and contribution. It is indeed a measure of the ruthlessness of elite-controlled knowledge-production that a figure as important as Savitribai Phule fails to find any mention in the history of modern India. Her life and struggle deserves to be appreciated by a wider spectrum, and made known to everybody.

Monday, February 10, 2014

A real fight between political wrestler Mulayam Yadav and young Turks of Bahujan Class.


This is a real fight between political wrestler Mulayam  Yadav and young Turks of Bahujan Class,  who are thundering their voice in favour of  3 -tier reservation formulae  in all government Jobs in Uttar Pradesh.  They have started their ‘Arakshan March’ from Allahabad (Headquarter of UPPSC) to Lucknow.

They have been in struggle since June, 2013 and they marched once to Lucknow in huge numbers estimated  around Ten thousands. They all lashed by the current regime Akhilesh Yadav’s government and when they met Akhilesh Yadav, he vehemently rejects their demands.  Now this MOVEMENT for Social justice is again riding on popular wave at whole Purvanchal area. The students leaders from Bahujan class are leading this fresh movement for social Justice after Mandal wave in post globalized era. 

The biggest illusion for Mulayam Singh is that he dreams to be Mr. Prime Minister of India that is why he does not want to disturb the voters of general categories at this crucial moment. It would be a  double-edged sword riding for Mulayam singh, Biggest OBC leader in Uttar Pradesh, very interesting to see how he manage his base vote-banks(OBCs and Socialist base)  and make a sweet cake for general categories simultaneously.

I have been in touch since the inception of this movement and I dare to say that Young blood of Yadavs do not want to fall in Mulayam styled Socialism.

Monday, August 5, 2013

मंडल आयोग के 28 साल और पूंजीवाद के दौर में सामाजिक न्याय



पूरे देश में 7 अगस्त को ‘सामाजिक न्याय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का आदेश दिया था। मंडल आयोग की रिपोर्ट में प्रमुख रूप से 13 अनुसंशाओ का वर्णन है जिसमे अभी तक दो अनुसंशाये ही लागू हो पाई है।  भारतीय संविधान के भाग-3 में वर्णित मौलिक अधिकार  के अनु. 16(4) के तहत OBC को सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण तथा अनु. 15(4) के अनुसार शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण का प्रावधान किया गया है। अतः मंडल कमीशन की अनुसंशायें आकाश से टपक कर खजूर में लटक गयी है। बीते 22 सालों में देश की राजनीती में कई राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक बदलाव हुए है। दलित-पिछड़ों का राजनीतक उभार अब ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक परिलक्षित होता है, बावजूद इसके मंडल कमीशन की सभी संस्तुतियों का लागू न होना एक संदेह को जन्म देता है. आखिर कौन सी मजबूरियां है जो आबादी के सबसे बड़े हिस्से को उसके वाजिब राजनैतिक, आर्थिक तथा शैक्षिक अधिकारों से वंचित कर रखा है? आरक्षण और सामाजिक न्याय कैसे एक-दूसरे के पूरक है? मंडल कमीशन ने कैसे जाति-आधारित शोषित समाज को एक बड़े वर्ग के रूप में परिवर्तित कर दिया?  इन सबकी पड़ताल करना जरूरी हो जाता है।

भारत में सामाजिक न्याय का जनक छत्रपति शाहूजी महाराज को कहा जाता है, जिन्होंने पहली बार अपने राज्य में शूद्रों और अछूतों को नौकरियों, प्रशासन में आरक्षण दिया था.
 भारत को आजादी मिलने के बाद पिछड़े तबकों (ST/SC/BC/Minorities)  ने अपने हक़-हकूक के लिए आवाज उठाना शुरू कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु के ऊपर काफी दबाव था कि देश के शोषित तबके को उनका वाजिब हक़ प्रदान करे। डा. भीमराव आंबेडकर ने अपने अथक प्रयासो से देश के शोषितों के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान कर गए,  लेकिन ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ के लिए संविधान  में एक आयोग के गठन की संभावना के अलावा और कुछ नहीं था। 
संविधान का अनु. 340 पिछड़े वर्गों की दशाओं के विश्लेषण के लिए एक आयोग की नियुक्ति का प्रावधान करता है।

अनु. 340(1)-  राष्ट्रपति भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सामाजिक तथा शिक्षित द्रष्टि से पिछड़े वर्गों की दशाओं के और जिन कठिनाईयों का वे सामना कर रहे है उनके अन्वेषण के लिए और उन कठिनायियों को दूर करने तथा उनकी दशा सुधरने हेतु संघ या किसी राज्य द्वारा जो उपाय किये जाने चाहिए उनके बारे सिफारिश करने के लिए, आदेश द्वारा एक आयोग नियुक्ति कर सकेगा जो ऐसे व्यक्तियों से मिलकर बनेगा जो वह ठीक समझे और ऐसे आयोग को नियुक्ति वाले आदेश में आदेश द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया परिनिश्चित की जाएगी।

अनु. 340(2)- इस प्रकार नियुक्त आयोग अपने को निर्देशित विषयों का अन्वेषण करेगा और राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा, जिसमें उसके द्वारा पाए गए तथ्य उपवर्णित किये जायेगे और जिसमें ऐसी सिफारिशें की जाएगी जिन्हें आयोग उचित समझे।

अनु. 340(3)- राष्ट्रपति इस प्रकार दिए गए प्रतिवेदन की एक प्रति, उस पर की गयी कार्यवाई को स्पष्ट करने वाले ज्ञापन सहित, संसद के प्रत्येक सदन में रखा जायेगा।

अतः अनु. 340 के अनुदेश के तहत 1953 में काका कालेलकर के नेतृत्व में एक ‘बैकवर्ड क्लासेस कमीशन’ का गठन हुआ जो ‘पिछड़े’ वर्गों व जातियों की पहचान करेगा, भारत के समस्त समुदायों की सूची बनाएगा और उनकी समस्याओं का निरीक्षण करेगा तथा उनकी बेहतरी के लिए कुछ ठोस प्रस्ताव लायेगा। काका कालेलकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1955 में केंद्र सरकार को सौंप दिया लेकिन स्वनाम-धन्य समाजवादी प्रधानमंत्री नेहरु ने इसे लागू करना आवश्यक नहीं समझा. काका कालेलकर के ऊपर भी ये आरोप लगता है कि उन्होंने जान-बूझ कर ऐसी सिफारिशे प्रस्तुत की जो केंद्र सरकार को रास न आई। हालाँकि राज्य सरकारों को ये अथारिटी मिल गयी कि वे स्वयं पिछड़े वर्गों की सूची तैयार करे और इन्हें ‘विशेष अवसर की सुविधा’ प्रदान करे. (स्रोत-भारतीय संविधान, डी.डी. बसु)| काका कालेलकर कमीशन की नाकामियों के चलते दूसरे ‘बैकवर्ड क्लासेस कमीशन’ के गठन की जरूरत पड़ी। 1 जनवरी 1979 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के समय राष्ट्रपति के आदेशानुसार बी.पी. मंडल (BC) के चेयरमैनशिप में दूसरा बैकवर्ड क्लासेस कमीशन का गठन हुआ जिसके अन्य सदस्य आर.आर. भोले, दीवान मोहनलाल, एल.आर. नाईक तथा के. सुब्रमनियम थे। पूरे देश में यह आयोग मंडल आयोग के नाम से प्रसिद्ध हुआ| मंडल कमीशन ने दिसंबर 1980 में अपनी रिपोर्ट  केंद्र सरकार को सौंप दिया।

मंडल कमीशन के प्रमुख उद्देश्य थे- सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को चिन्हित करने के लिए मानको को निश्चित करना, उनकी प्रगति के लिए महत्वपूर्ण अनुसंशाओं को प्रस्तावित करना, उनकी दशा सुधारने हेतु पदों और नियुक्तियों में आरक्षण क्यों जरूरी है, इसका निरीक्षण करना और कमीशन द्वारा प्राप्त तथ्यों को रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत करना। सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को चिन्हित करने के लिए मंडल कमीशन ने कुल 11 मानको को अपनाया जिन्हें प्रमुखतया 3 समूहों में वर्गीकृत जा सकता है- सामाजिक, शैक्षिक तथा आर्थिक. इस प्रकार मंडल कमीशन ने 1931 की जनगणना ने अनुसार 52% पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण की अनुसंशा की। (नोट- इस 52% पिछड़े वर्ग की आबादी में अल्पसंख्यकों की कुल आबादी 16.6% का 52% अल्पसंख्यक पिछड़े वर्ग को भी कुल आरक्षण 27% में समाहित किया गया)।  यहाँ मंडल कमीशन की प्रमुख अनुसंशाओं का उल्लेख करना चाहूँगा।


1-      अनु. 15(4) और 16(4) के तहत 50% आरक्षण की सीलिंग है और SCs/ STs को उनकी आबादी के अनुपात में 22% मिला हुआ है. अतः कमीशन OBCs के लिए 27% आरक्षण प्रस्तावित करता है. अनु. 15(4) और अनु. 29(2)- (अल्पसंख्यकों को सरंक्षण) राज्य के ऊपर कोई वैधानिक प्रतिबन्ध नहीं करता यदि वह सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्राविधान बनाये. इसी तरह अनु.16(4)  राज्य को नहीं रोकेगा यदि राज्य  राजकीय नौकरियों तथा नियुक्तियों में  सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व न होने से पदों तथा नियुक्तियों में उनके लिए आरक्षण की अनुसंशा करे।

2-      सरकारी नौकरियों में शामिल OBC  उम्मीदवारों को प्रोन्नति में भी 27% आरक्षण मिलना चाहिए।

3-      केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन चलने वाली वैज्ञानिक, तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए OBC वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27% आरक्षण लागू किया जाये।

4-      OBC की आबादी वाले क्षेत्रों में वयस्क शिक्षा केंद्र तथा पिछड़ें वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए आवासीय विद्यालय खोले जाए. OBC  छात्रों को रोजगार परक शिक्षा  दी जाये।

5-       OBC की विशाल आबादी जीविका के लिए पारंपरिक तथा जातिपरक काम में लगी हुयी है. इनकी दयनीय आर्थिक हालत को देखते हुए इन्हें संस्थागत वित्तीय, तकनीकी सहायता देने तथा इनमें उद्यमी द्रष्टिकोण विकसित करने के लिए वित्तीय, तकनीकी संस्थाओं का समूह तैयार करे।

6-      प्रत्येक जाति परक पेशे के लिए सहकारी समितियां गठित की जाये जिनके तमाम कार्यकर्ता, कर्मचारी और अधिकारीगण उसी जातिगत पेशे से जुड़े होने चाहिए।

7-       जमींदारी प्रथा को ख़त्म करने के लिए भूमि सुधार कानून लागू किया जाये क्योंकि पिछड़े वर्गों की बड़ी जमात जमींदारी प्रथा से सताई हुयी है।

8-      सरकार द्वारा अनुबंधित जमीन को न केवल ST/ST को दिया जाये बल्कि OBC को भी इसमें शामिल किया जाये।

9-       OBC के कल्याण के लिए राज्य सरकारों द्वारा बनाई गयी तथा चलायी जा रही तमाम योजनाओ, कार्यक्रमों को लागू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाये।

10-    केंद्र और राज्य सरकारों में OBC  के हितों की सुरक्षा के लिए अलग मंत्रालय/विभाग स्थापित किये जाये।

11-    आयोग की अनुशंसाओं का क्या परिणाम निकला, उन्हें कहाँ तक लागू किया गया इसकी समीक्षा 20 वर्ष के बाद की जाये।

1990 में जब प्रधानमंत्री विश्वनाथ सिंह ने मंडल कमीशन को लागू किया तो उच्च वर्णीय/ बुर्जुआ ताकतों को अपने राजनैतिक-आर्थिक वर्चस्व में एक जोर का झटका लगा नतीजन इन प्रतिक्रियावादी ताकतों ने वी.पी. की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इन ताकतों ने आरक्षण विरोधी आन्दोलन पूरे देश में चलाया जिसका नेतृत्व  देश के कथित इलीट,कुलक, सामंत, डाक्टर, इंजिनियर, शिक्षकों ने किया. इसी समय देश में दो महत्वपूर्ण राजनैतिक  तथा आर्थिक बदलाव हुए। धार्मिक उन्माद को पूरे देश में इतना प्रचारित/प्रसारित किया गया कि कमंडल के आगे मंडल कमजोर पड़ गया। राजनीति का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण कर दिया गया अर्थात हिन्दू बनाम मुसलमान। लेकिन असलियत कुछ और थी, धर्म आधारित राजनीती का नेतृत्व हमेशा प्रभु वर्ग ने किया है जो हर धर्म का सबसे ऊपरी तबका होता है, अर्थात धर्म के निचले पायेदान मे पाए जाने वाले लोगों का राजनैतिक व्यवस्था के निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में कोई योगदान नहीं रहता। उनका इस्तेमाल धार्मिक उन्माद फ़ैलाने में, भिन्न-भिन्न धार्मिक पहचान के आधार पर एक दुसरे को लड़ाने में किया जाता है। यदि मंदिर-मस्जिद विवाद से दुष्प्रभावित समूहों के आंकड़े ईमानदारी से इकट्ठे किये जाये तो सबसे ज्यादा निम्न वर्णीय/ सर्वहारा लोग ही होंगे। इस प्रकार सामंती ताकतों तथा प्रभु वर्ग ने अपने वर्चस्व को बनाये रखने करने के लिए पूरे प्रयास किये. दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव आर्थिक था- देश में LIBERALISATION, PRIVETISATION और GLOBALISATION को ख़ुशी ख़ुशी लाया जाता है। पब्लिक सेक्टर  का डि-रेगुलराइजेशन आरम्भ हो जाता है। शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को आम बजट में कोई खास जगह नहीं दी जाती है। इन दोनों का तेजी से निजीकरण शुरू हो जाता है। देश की निजी कंपनियों को अपार प्रोत्साहन दिया जाता है और उन्हें किसानों से कई गुना ज्यादा सब्सिडी दी जाती है। पब्लिक सेक्टर तथा सरकारी संस्थानों के निजी हाथों में चले जाने से वहां आरक्षण का कोई स्कोप ही नहीं बचता है, अतः देश की प्रतिक्रियावादी ताकतों ने अपने निजी हितों के सरंक्षण में देश की प्रगति पर कुठाराघात कर दिया। जबकि इन प्रतिक्रियावादी ताकतों को आरक्षण को दक्षिण अफ्रीका में लागू  “AFFIRMATIVE ACTION”  के रूप में देखना चाहिए। 
जब दक्षिण अफ्रीका  में अश्वेतों ने अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन शुरू किया और राजनैतिक-आर्थिक-शैक्षिक-सांस्कृतिक यानि हर क्षेत्र में हिस्सेदारी की मांग की तो वहां के बुर्जुवा वर्ग ने स्वयं बढ़कर उन्हें आर्थिक-राजनैतिक  तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण दे दिया. दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत बहुसंख्यक है अतः उनके हक़-हकूक को किनारे करना देश को पतन के रास्ते पर ले जाना है। देश की प्रगति के लिए सभी देशवासियों की प्रगति आवश्यक है, आज वहां श्वेत तथा अश्वेत दोनों मिलकर देश की उन्नति में लगे हुए है। दक्षिण अफ्रीका को 1992 में आजादी मिली और आज वो अफ्रीका महादेश के एक विकसित देश के रूप में उभर रहा है। लेकिन भारत ने वो मौका खो दिया. यहाँ का  अल्पसंख्यक-बुर्जुआ वर्ग ने अपने टूटते वर्चस्व को बचाने के लिए अपना अंतिम प्रयास कर रहा है और देश को पूंजीवादी कार्टेल के हाथो में बेंचने के लिए तैयार बैठा है।

ये प्रतिक्रियावादी ताकते नब्बे के दशक में देश को धार्मिक उन्माद की भट्टी में झोंक दिया, और चली आ रही मिश्रित अर्थव्यवस्था की ‘शाक थेरेपी’ कर पूंजीवादी अर्थव्यस्था में बदल दिया। इन्होने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिया कि यह रिपोर्ट पूरी तरह ‘असंवैधानिक’ है। 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार केस में नौ जजों की खंड-पीठ ने मंडल कमीशन रिपोर्ट की असंवैधानिकता को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया और सरकार को निर्देश दिया कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को इनैक्ट करे। 1 फरवरी 1993 को 5 सदस्यों वाले आयोग का गठन हुआ, जिसके प्रथम चेयरमैन जस्टिस आर.एन. प्रसाद बने। इंदिरा साहनी केस ने दो आवश्यक मुद्दों की तरफ ध्यान खींचा-1-पिछड़े वर्ग को हिन्दू धर्म के अन्दर अनेक जातियों को उनके पेशे, गरीबी, स्थान विशेष में आवास करना और अशिक्षा के कारण चिन्हित किया जा सकता है। 2- पिछड़ा वर्ग में आने के लिए क्रीमी लेयर का प्रावधान कर दिया. यदि पहले मुद्दे कि तरफ देखा जाये तो कोर्ट इस बात को मानता है कि पिछड़े वर्गों को हिन्दू धर्म के अन्दर देखा जा सकता है, यानि निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि पिछड़े वर्ग में आने वाली जातियां हिन्दू धर्म को मानने वाली है ऐसा इसलिए कि इस वर्ग को आरक्षण उनके पेशे, गरीबी, स्थान विशेष में आवास करना और अशिक्षा के कारण दिया गया है, न कि उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर। इस मुद्दे पर और भी बहस की जरूरत है। दूसरा मुद्दा ‘मलाईदार परत’ का है जो बुर्जुआ वर्ग की पिछड़े वर्गों के खिलाफ एक साजिश थी। क्योंकि मंडल कमीशन की रिपोर्ट में कही भी मलाईदार परतका उल्लेख नहीं है। अतः क्रीमी लेयर का बंधन लगाकर बुर्जुआ वर्ग ने देश के बहुसंख्यक सर्वहारा वर्ग के बीच बन रही एकता को तोड़ दिया। मंडल कमीशन की दूसरी सिफारिश ‘केंद्र और राज्य  सरकारों के अधीन चलने वाली वैज्ञानिक, तकनीकी  तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए  OBC वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27 % आरक्षण लागू किया जाये’ को केंद्रीय संस्थानों में 2007 में लागू किया गया। लेकिन विश्वविद्यालयों तथा अन्य इलीट शिक्षा संस्थानों में जातिवादी प्रशासन के वर्चस्व के चलते इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका। एक आंकडे के मुताबिक पूरे देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में OBC कोटे से मात्र 2 प्रोफ़ेसर है. देश के विभिन्न मंत्रालयों, अन्य स्वायत्तशासी संस्थाओं तथा पब्लिक सेक्टर में OBCs क्लास-1 नौकरियों में 4.69%, क्लास-2 में 10.63%, क्लास-3 में 18.98% तथा क्लास-4 में 12.55% है। इन दो अनुसंशाओ के अतिरिक्त अन्य अनुसंशाओ मसलन भूमि सुधार तथा OBC को आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिए केंद्र/राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित अनुदान आदि को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया।

मंडल कमीशन की अनुसंशाओ को लेकर देश के प्रमुख राजनैतिक दलों के क्या रवैया रहा, इसे जानना भी जरूरी है. 1992 में जब कमीशन की सिफारिशों को लागू किया गया तो कांग्रेस की तत्कालीन नरसिम्हाराव सरकार ने इसका श्रेय लेने की कोशिश की| क्रीमी लेयर के बंधन के खिलाफ कुछ नहीं किया। OBC वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए विश्वविद्यालयों में 27% आरक्षण लागू किया जायेको केंद्रीय संस्थानों में 2007 में लागू किया गया तो सामान्य वर्ग के लिए 27% अतिरिक्त सीटों को बढ़ा दिया. तथा OBC वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27 % आरक्षण लागू करने के लिए अवधि निश्चित की। कहीं–कहीं तो इसे 2012 तक नहीं लागू किया जा सका। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में यह 2011 को लागू हुआ। 2012 के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 4.5% का अल्पसंख्यक (OBC) कार्ड खेला लेकिन असफल रही। दूसरी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी भाजपा धर्म-नीति-राजनीती करती है। उसने मंडल कमीशन की शिफरिशों को लागू करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। प्रमुख वामपंथी दल माकपा तो अभी तक OBCs को ‘सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़ा  मानती है और क्रीमी-लेयर के बंधन का समर्थन करती है (माकपा का प्रेस वक्तव्य, 17 मई 2006)।  पश्चिम बंगाल में माकपा की 34 साल तक सरकार रही लेकिन OBC को एक वर्ग के रूप स्वीकार नहीं कर पाई जिससे माकपा के चाल,चरित्र और चेहरे में उच्च वर्णीय/उच्च वर्गीय ठसक देखी जा सकती है। माकपा ने 2011 में OBCs के लिए 17% आरक्षण लागू किया जिसमे सभी मुसलमानों को ‘पिछड़े वर्ग’ के रूप में देखा गया है। अन्य राजनैतिक दल जिनका नेतृत्व दलित-पिछड़ा वर्ग के लोगों के हाथों में है, वे मंडल कमीशन को राजनैतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। मुलायम यादव, लालू प्रसाद, नितीश कुमार तथा मायावती ने कभी भी मंडल कमीशन की सभी अनुसंशाओ को लागू करने के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई। इन सभी का संघर्ष कुर्सी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। इन सभी दलों के पास आर्थिक प्रोग्राम का आभाव है| ये सभी भूमि सुधार कानून को लागू करवा सकते है और पिछड़े वर्गों की राजनैतिक-आर्थिक-शैक्षिक उन्नति के लिए कई महत्वपूर्ण काम कर सकते है।  अब जरूरत है एक नए नेतृत्व की जो सामाजिक न्याय, हिस्सेदारी तथा व्यवस्था परिवर्तन हेतु एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन करें।

देश का सर्वहारा वर्ग निरादर तथा गरीबी से ग्रसित है। वर्तमान  समय की जरूरत है कि ST/SC के आरक्षण के साथ OBCs  की राजनैतिक-आर्थिक उन्नति के लिए मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूर्णतया लागू की जाये। OBC आरक्षण का विस्तार सभी सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़ों वर्गों तक होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार OBCs के रिजर्वेशन के लिए क्रीमी लेयर के रूप में जो आर्थिक रेखा खीच दी गयी है वो संविधान के महत्व को कम कर रही है तथा ये पूरी तरह से अ-संवैधानिक है।

'क्रीमी-लेयर' शब्द न तो संविधान और न ही मंडल कमीशन कि रिपोर्ट में अंकित है इसलिए क्रीमी-लेयर की कटेगरी को पूरी तरह से ख़त्म कर देनी चाहिए। ST और SC कमीशन की भांति OBC रिजर्वेशन के कार्यान्वन की देख-रेख हेतु संसदीय सब-कमेटी बने. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को SC और ST कमीशन की तरह पूर्ण संवैधानिक शक्तिया प्रदान की जाये जिससे OBC हेतु आरक्षण के साथ खिलवाड़ करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके और चेयरमैन के पद पर अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की जगह राजनीती, शिक्षा या मीडिया क्षेत्र के महत्वपूर्ण लोगों की नियुक्ति हो। आरक्षण के दायरे का विस्तार निजी क्षेत्रों में किया जाये, जिसमें प्रमुख रूप से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया में और NGOs  में दलित-पिछड़ों की भागेदारी को सुनिश्चित किया जाये। राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन हो तथा उसमें आरक्षण के सिद्धांत को पूरी तरह से लागू करना चाहिए। देश के सभी धार्मिक संस्थानों का सरकारीकरण कर दिया जाये, पुजारी पद के लिए ओपन कम्पटीशन हो। जाति-आधारित जनगणना जल्द से जल्द करवाई जाये। जिससे ये सभी शोषित तबकों के बीच मजबूत गठजोड़ हो| यही गठजोड़ बुर्जुआ, पूंजीवाद, सामंतवाद तथा जातिवाद से लड़कर सामाजिक क्षेत्र में मानववाद तथा आर्थिक क्षेत्र में समाजवाद को पुनः स्थापित करेगा।

 Contact @ anoops.patel@gmail.com, 9415455820